जनकपुर (धनुषा), नेपाल। मधेश प्रदेश में बढ़ते जलवायु जोखिमों से निपटने और कृषि, खाद्य सुरक्षा तथा स्थानीय समुदायों की आजीविका को सुरक्षित रखने के उद्देश्य से धनुषा जिले के जनकपुर में एक महत्वपूर्ण प्रांतीय कार्यशाला का आयोजन किया गया। “Provincial Workshop on the Impacts of Super El Niño, Heatwaves, and Droughts in Madhesh Province” विषय पर आयोजित इस कार्यशाला में प्रांतीय सरकार के प्रतिनिधियों, संयुक्त राष्ट्र एजेंसियों, विकास साझेदारों, स्थानीय आपदा प्रबंधन से जुड़े अधिकारियों तथा विभिन्न संबंधित संस्थाओं ने भाग लिया।
कार्यशाला का संयुक्त आयोजन FAO Nepal, Mercy Corps और Aasaman Nepal द्वारा किया गया। कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य मधेश प्रदेश पर संभावित सुपर अल नीनो, अत्यधिक गर्मी (हीटवेव) और सूखे के प्रभावों का आकलन करना तथा इनसे निपटने के लिए समय रहते प्रभावी रणनीति तैयार करना था। बैठक में वक्ताओं ने कहा कि जलवायु परिवर्तन के कारण मौसम का स्वरूप तेजी से बदल रहा है। अत्यधिक तापमान, अनियमित वर्षा, लंबे समय तक सूखे की स्थिति और पानी की उपलब्धता में कमी जैसी चुनौतियां सीधे तौर पर कृषि उत्पादन, पशुपालन, खाद्य सुरक्षा और ग्रामीण आबादी की आय को प्रभावित कर सकती हैं। विशेषज्ञों ने इस बात पर जोर दिया कि आपदा आने के बाद राहत और बचाव तक सीमित रहने की पारंपरिक व्यवस्था को बदलने की आवश्यकता है। इसके बजाय आपदा से पहले जोखिम की पहचान, पूर्व चेतावनी, स्थानीय स्तर पर तैयारी और समय से कार्रवाई को प्राथमिकता देने की जरूरत है।
जलवायु जोखिमों पर गंभीर मंथन
जनकपुर में आयोजित इस प्रांतीय कार्यशाला में मधेश प्रदेश के सामने मौजूद जलवायु संबंधी चुनौतियों पर विस्तृत चर्चा हुई। कार्यक्रम में विशेष रूप से सुपर अल नीनो, हीटवेव और सूखे जैसी परिस्थितियों के संभावित प्रभावों को केंद्र में रखा गया। मधेश प्रदेश नेपाल के प्रमुख कृषि क्षेत्रों में शामिल है। यहां की बड़ी आबादी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से कृषि और उससे जुड़ी गतिविधियों पर निर्भर है। ऐसे में लंबे समय तक बारिश नहीं होना, अत्यधिक गर्मी पड़ना या सिंचाई के लिए पर्याप्त पानी उपलब्ध न होना स्थानीय अर्थव्यवस्था और लोगों की आजीविका पर व्यापक प्रभाव डाल सकता है। कार्यशाला में यह भी चर्चा की गई कि जलवायु जोखिम केवल पर्यावरण से जुड़ी समस्या नहीं है, बल्कि इसका सीधा संबंध खाद्य सुरक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, आय, जल उपलब्धता और सामाजिक सुरक्षा से है। प्रतिभागियों ने माना कि बदलती जलवायु परिस्थितियों के बीच स्थानीय प्रशासन, प्रांतीय सरकार, विकास साझेदारों और समुदायों के बीच बेहतर समन्वय जरूरी है।
राहत से पहले तैयारी
कार्यशाला में सबसे महत्वपूर्ण मुद्दों में से एक था कि आपदा प्रबंधन की मौजूदा व्यवस्था को प्रतिक्रियात्मक मॉडल से निकालकर पूर्व तैयारी आधारित मॉडल में बदला जाए। विशेषज्ञों ने कहा कि किसी क्षेत्र में हीटवेव, सूखा या अत्यधिक गर्मी की स्थिति उत्पन्न होने के बाद राहत पहुंचाने की बजाय पहले से संभावित जोखिमों की पहचान की जानी चाहिए। इसके लिए मौसम संबंधी जानकारी, जल उपलब्धता, कृषि उत्पादन और स्थानीय जोखिमों से जुड़े आंकड़ों का उपयोग किया जाना आवश्यक है। Early Warning System यानी पूर्व चेतावनी प्रणाली को मजबूत करने पर विशेष बल दिया गया। वक्ताओं के अनुसार यदि किसानों और स्थानीय समुदायों को समय रहते मौसम और जलवायु संबंधी चेतावनी मिल जाए तो वे फसल चयन, सिंचाई, बुवाई का समय और अन्य कृषि गतिविधियों को परिस्थितियों के अनुसार बदल सकते हैं।इसी तरह स्थानीय प्रशासन भी संभावित संकट को देखते हुए पानी, स्वास्थ्य सेवाओं, कृषि सहायता और अन्य आवश्यक संसाधनों की पहले से व्यवस्था कर सकता है।
कृषि और खाद्य सुरक्षा की चुनौती
मधेश प्रदेश को नेपाल के महत्वपूर्ण कृषि क्षेत्रों में माना जाता है। इसलिए यहां जलवायु परिवर्तन का प्रभाव केवल स्थानीय स्तर तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इसका असर व्यापक खाद्य आपूर्ति और खाद्य सुरक्षा पर भी पड़ सकता है। कार्यशाला में जलवायु-सहिष्णु कृषि व्यवस्था विकसित करने की आवश्यकता पर चर्चा हुई। विशेषज्ञों ने ऐसी कृषि तकनीकों और फसल प्रणालियों को बढ़ावा देने की जरूरत बताई, जो अत्यधिक गर्मी, पानी की कमी और अनियमित मौसम का सामना कर सकें। इसके साथ ही efficient water management यानी कुशल जल प्रबंधन को भी महत्वपूर्ण समाधान के रूप में सामने रखा गया। सिंचाई के पानी का बेहतर उपयोग, जल संरक्षण, स्थानीय जल स्रोतों की सुरक्षा और पानी की उपलब्धता के अनुसार कृषि योजना बनाने की आवश्यकता पर जोर दिया गया। किसानों तक मौसम संबंधी विश्वसनीय जानकारी पहुंचाने के साथ-साथ उन्हें जलवायु जोखिमों के अनुरूप खेती की तकनीक, फसल विविधीकरण और जल संरक्षण के उपायों की जानकारी देना भी जरूरी बताया गया।
नीतियों और बजट में जलवायु रणनीति शामिल करने की प्रतिबद्धता
कार्यशाला में प्रांतीय सरकार के महत्वपूर्ण अधिकारियों और संबंधित विभागों के प्रतिनिधियों ने जलवायु जोखिमों से निपटने के लिए नीतिगत स्तर पर कार्रवाई की आवश्यकता पर जोर दिया। Provincial Policy and Planning Commission तथा Ministry of Forest and Environment से जुड़े प्रतिनिधियों ने संकेत दिया कि जलवायु जोखिमों को केवल आपदा प्रबंधन से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि उन्हें विकास योजनाओं, स्थानीय बजट और सरकारी नीतियों का हिस्सा बनाया जाना चाहिए। विशेष रूप से Heat Action Plans को स्थानीय स्तर पर लागू करने तथा जलवायु जोखिम रणनीतियों को बजट और योजनाओं में शामिल करने की आवश्यकता पर चर्चा हुई। वक्ताओं के अनुसार यदि जलवायु जोखिमों को पहले से योजनाओं में शामिल किया जाए तो आपदा के समय होने वाली आर्थिक और सामाजिक क्षति को काफी हद तक कम किया जा सकता है। प्रांतीय और स्थानीय निकायों के बीच बेहतर समन्वय, स्थानीय आपदा प्रबंधन तंत्र की क्षमता बढ़ाने और समुदायों को निर्णय प्रक्रिया में शामिल करने को भी महत्वपूर्ण बताया गया।
सामुदायिक स्तर पर तैयारी जरूरी
कार्यशाला में यह बात प्रमुखता से सामने आई कि जलवायु जोखिमों से निपटने की रणनीति तभी प्रभावी हो सकती है जब इसमें स्थानीय समुदायों की सक्रिय भागीदारी हो। ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले किसान, मजदूर, महिलाएं, बच्चे, बुजुर्ग तथा आर्थिक रूप से कमजोर परिवार अत्यधिक गर्मी, सूखे और जल संकट से अधिक प्रभावित हो सकते हैं। इसलिए स्थानीय स्तर पर जोखिम की पहचान और संवेदनशील समूहों की सूची तैयार करने जैसी व्यवस्थाओं को मजबूत किया जाना आवश्यक है। स्थानीय आपदा प्रबंधन focal points को अधिक सक्षम बनाने और उन्हें मौसम तथा जलवायु संबंधी जानकारी समय पर उपलब्ध कराने पर भी जोर दिया गया। विशेषज्ञों का मानना है कि समुदाय आधारित आपदा तैयारी से स्थानीय लोग केवल राहत पाने वाले नहीं, बल्कि संकट से पहले तैयारी करने और संकट के दौरान प्रतिक्रिया देने वाले सक्रिय भागीदार बन सकते हैं।
हीटवेव के बढ़ते खतरे पर विशेष ध्यान
कार्यशाला में अत्यधिक गर्मी और हीटवेव को भी गंभीर जोखिम के रूप में देखा गया। लंबे समय तक सामान्य से अधिक तापमान रहने से मानव स्वास्थ्य के साथ-साथ कृषि, पशुपालन और पानी की उपलब्धता पर भी दबाव बढ़ सकता है। ऐसी परिस्थितियों में स्थानीय प्रशासन द्वारा पहले से Heat Action Plan तैयार करना उपयोगी हो सकता है। इसके तहत संवेदनशील आबादी की पहचान, सार्वजनिक सूचना प्रणाली, पेयजल की उपलब्धता, स्वास्थ्य संस्थानों की तैयारी और अत्यधिक गर्मी के समय लोगों को सावधानी संबंधी जानकारी देने जैसी व्यवस्थाएं की जा सकती हैं। विशेषज्ञों ने कहा कि हीटवेव को केवल मौसम की असामान्य घटना के रूप में नहीं, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य और आजीविका से जुड़े जोखिम के रूप में देखने की आवश्यकता है।
सूखे से निपटने के लिए जल प्रबंधन महत्वपूर्ण
मधेश प्रदेश में कृषि और ग्रामीण जीवन के लिए पानी अत्यंत महत्वपूर्ण है। ऐसे में सूखे की स्थिति लंबे समय तक बनी रहने पर कृषि उत्पादन और ग्रामीण अर्थव्यवस्था प्रभावित हो सकती है। कार्यशाला में जल संसाधनों के बेहतर उपयोग और संरक्षण पर चर्चा करते हुए कहा गया कि भविष्य की जलवायु परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए पानी के उपयोग की योजना बनाई जानी चाहिए। सिंचाई व्यवस्था में दक्षता बढ़ाना, उपलब्ध जल का संरक्षण करना, वर्षा जल का बेहतर उपयोग करना तथा स्थानीय जल स्रोतों को सुरक्षित रखना जल संकट के प्रभाव को कम करने में मदद कर सकता है। साथ ही कृषि क्षेत्र में ऐसी फसलों और तकनीकों को प्रोत्साहित करने की आवश्यकता बताई गई जो कम पानी में भी बेहतर उत्पादन दे सकें।
बहु-क्षेत्रीय समन्वय को बताया समाधान
कार्यशाला में यह स्पष्ट किया गया कि जलवायु संकट किसी एक मंत्रालय या संस्था की जिम्मेदारी नहीं है। कृषि, वन एवं पर्यावरण, जल संसाधन, स्वास्थ्य, स्थानीय प्रशासन, आपदा प्रबंधन और विकास साझेदारों को मिलकर काम करना होगा। FAO नेपाल, Mercy Corps और Aasaman Nepal जैसे संगठनों की भागीदारी ने इस चर्चा को बहु-क्षेत्रीय स्वरूप प्रदान किया। प्रतिभागियों ने माना कि सरकारी संस्थाओं और विकास साझेदारों के बीच बेहतर तालमेल से स्थानीय स्तर पर जलवायु जोखिमों की पहचान, पूर्व चेतावनी और समय से कार्रवाई की क्षमता को मजबूत किया जा सकता है।
मधेश की तैयारी का असर पूरे नेपाल
मधेश प्रदेश की कृषि क्षमता को देखते हुए यहां जलवायु जोखिमों से निपटने की तैयारी का महत्व केवल प्रदेश तक सीमित नहीं है। यदि अत्यधिक गर्मी, सूखे या अनियमित मौसम के कारण कृषि उत्पादन प्रभावित होता है, तो इसका असर व्यापक खाद्य सुरक्षा पर पड़ सकता है। इसलिए विशेषज्ञों ने कहा कि मधेश में आज किए जाने वाले निवेश और तैयारी के प्रयास भविष्य में समुदायों को बड़े आर्थिक नुकसान से बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। पूर्व तैयारी, समय पर चेतावनी और स्थानीय स्तर पर त्वरित कार्रवाई को मजबूत करके जलवायु संकट के प्रभावों को कम किया जा सकता है।
रिपोर्ट : कोटो न्यूज़ नेटवर्क (KNN) |

