भारत, 2 फरवरी 2026| पिपरईच थाना क्षेत्र से जुड़ा एक मामला इन दिनों सोशल मीडिया और स्थानीय स्तर पर तेजी से वायरल हो रहा है। इस मामले में शिकायतकर्ता अंश निषाद द्वारा लगाए गए आरोपों ने पुलिस विभाग, बैंक प्रशासन और कुछ कथित गैंग सदस्यों की भूमिका पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े कर दिए हैं। सूत्रों और उपलब्ध शिकायतों के अनुसार यह पूरा मामला वर्ष 2022 से शुरू होकर अब 2026 तक पहुंच चुका है, जिसमें बार-बार विरोधाभासी रिपोर्टें, मुकदमे, चालान और प्रशासनिक कार्रवाइयां सामने आई हैं।

शिकायतकर्ता अंश निषाद, ग्राम महाराज जी, थाना पिपरईच, जनपद गोरखपुर के निवासी हैं। आरोप है कि उनके साथ एक सुनियोजित षड्यंत्र के तहत न केवल आर्थिक नुकसान पहुंचाया गया, बल्कि उन्हें मानसिक रूप से असंतुलित घोषित करने की कोशिश भी की गई।

सूत्रों के अनुसार, वर्ष 2022 में अंश निषाद की दुकान पर जिलाजीत कुमार द्वारा ऑनलाइन पेमेंट कर नकद राशि प्राप्त की गई। इसके बाद कथित रूप से जिलाजीत कुमार गैंग से जुड़े निठुरी प्रसाद, दुर्गेश जाटव और मुन्ना (जो खुद को पत्रकार बताते हैं) की भूमिका संदिग्ध बताई जा रही है। आरोप है कि इन लोगों ने भारतीय स्टेट बैंक, शाखा कजाकपुर, जिला गोरखपुर के कुछ अधिकारियों से मिलीभगत कर अंश निषाद का बैंक खाता फ्रीज करा दिया।
शिकायतकर्ता का कहना है कि बैंक में दी गई शिकायतों और पुलिस रिकॉर्ड में वर्षों की तारीखों को लेकर भारी विरोधाभास है। कहीं 2022 का उल्लेख है, तो कहीं 2024 में अचानक यह कहा गया कि पैसा “गलती से भेजा गया था।” इन तथ्यों ने पूरे मामले को और अधिक उलझा दिया है।

1 अगस्त 2025 को अंश निषाद ने जिलाधिकारी कार्यालय, गोरखपुर में एक विस्तृत लिखित शिकायत दी। इस शिकायत में उन्होंने कथित गैंग सदस्यों—निठुरी प्रसाद, दुर्गेश जाटव और मुन्ना—के नाम स्पष्ट रूप से दर्ज कराए। शिकायत में यह भी आरोप लगाया गया कि इन लोगों ने पुलिस और बैंक अधिकारियों की मदद से उन्हें फंसाने की साजिश रची।
इसी बीच, सूत्रों से यह जानकारी भी सामने आई कि दुर्गेश जाटव, जिसे इस कथित गैंग का मास्टरमाइंड बताया जा रहा है, वर्ष 2024 में अंश निषाद के खिलाफ शिकायत और मुकदमा दर्ज कराने के बाद विदेश चला गया। इसके बावजूद, आरोप है कि उसके बयान को प्रशासनिक फाइलों में दर्ज कर लिया गया, जो अपने-आप में एक गंभीर सवाल खड़ा करता है।

मामले ने उस समय और गंभीर मोड़ ले लिया जब एसएसपी कार्यालय से जुड़ी एक रिपोर्ट में यह टिप्पणी दर्ज की गई कि अंश निषाद का मानसिक संतुलन वर्ष 2018 से ठीक नहीं है। यही रिपोर्ट बाद में विभिन्न प्रशासनिक दस्तावेजों में संदर्भ के रूप में प्रयुक्त होती दिखी।
हालांकि, यहीं से विरोधाभास शुरू होता है। यदि किसी व्यक्ति का मानसिक संतुलन 2018 से ही ठीक नहीं है, तो फिर किस आधार पर वर्ष 2023 में कैंट थाना, गोरखपुर द्वारा अंश निषाद का चालान किया गया? इसके अलावा, स्थानीय थाना पिपरईच द्वारा धारा 151 के अंतर्गत चालान कार्रवाई की गई। कानून विशेषज्ञों के अनुसार, मानसिक रूप से असंतुलित व्यक्ति के मामले में धारा 151 जैसी कार्रवाई अपने-आप में कानूनी जांच की मांग करती है।

इन्हीं विरोधाभासों के चलते अब सवाल सीधे पुलिस विभाग की भूमिका पर उठ रहे हैं। एक ओर पुलिस रिपोर्ट में व्यक्ति को मानसिक रूप से असंतुलित बताया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर उसी व्यक्ति के खिलाफ आपराधिक प्रक्रिया के तहत चालान और कार्रवाई की जा रही है। सूत्रों का दावा है कि यह पूरा प्रकरण केवल प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि एक सोची-समझी मिलीभगत का परिणाम हो सकता है।
स्थानीय लोगों और सामाजिक संगठनों का कहना है कि यदि आरोप सही हैं, तो यह मामला केवल एक व्यक्ति के उत्पीड़न तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे सिस्टम की विश्वसनीयता पर सवाल खड़ा करता है। बैंक प्रबंधन, पुलिस विभाग और कथित गैंग सदस्यों के बीच संबंधों की निष्पक्ष जांच की मांग तेज हो रही है।

क्या हैं मुख्य सवाल?
1. यदि अंश निषाद का मानसिक संतुलन 2018 से ठीक नहीं था, तो 2023 में उनके खिलाफ चालान किस आधार पर हुआ?
यह इस पूरे प्रकरण का सबसे बड़ा और गंभीर सवाल है। पुलिस विभाग की रिपोर्ट के अनुसार यदि अंश निषाद का मानसिक संतुलन वर्ष 2018 से ही ठीक नहीं था, तो कानूनन उन्हें एक सामान्य अपराधी की तरह ट्रीट नहीं किया जा सकता। भारतीय कानून और न्यायिक प्रक्रियाओं के तहत मानसिक रूप से असंतुलित व्यक्ति के साथ विशेष संवेदनशीलता और चिकित्सकीय परीक्षण के आधार पर कार्रवाई की जाती है।
इसके बावजूद वर्ष 2023 में कैंट थाना, गोरखपुर द्वारा अंश निषाद का चालान किया जाना कई सवाल खड़े करता है। क्या चालान से पहले किसी सक्षम चिकित्सक द्वारा उनका मानसिक परीक्षण कराया गया था? क्या अदालत या मजिस्ट्रेट के समक्ष यह तथ्य रखा गया कि संबंधित व्यक्ति मानसिक रूप से असंतुलित बताया जा चुका है? यदि नहीं, तो यह सीधे-सीधे प्रक्रिया का उल्लंघन माना जा सकता है।
कानून विशेषज्ञों का कहना है कि यदि कोई व्यक्ति मानसिक रूप से अस्वस्थ घोषित किया जाता है, तो उसके खिलाफ धारा 151 जैसी कार्रवाई तभी हो सकती है जब मेडिकल रिपोर्ट और न्यायिक अनुमति स्पष्ट रूप से उपलब्ध हो। ऐसे में यह आशंका और प्रबल होती है कि “मानसिक असंतुलन” की रिपोर्ट केवल जरूरत के हिसाब से, बाद में तैयार की गई हो।

2. विदेश में रह रहे व्यक्ति का बयान प्रशासनिक रिकॉर्ड में कैसे दर्ज किया गया?
इस मामले का दूसरा चौंकाने वाला पहलू यह है कि जिस व्यक्ति—दुर्गेश जाटव—को कथित रूप से इस पूरे प्रकरण का मास्टरमाइंड बताया जा रहा है, वह सूत्रों के अनुसार वर्ष 2024 में विदेश चला गया। इसके बावजूद उसके बयान को प्रशासनिक और पुलिस रिकॉर्ड में दर्ज किए जाने की बात सामने आई है।
सवाल यह है कि जब कोई व्यक्ति देश में मौजूद ही नहीं है, तो उसका बयान किस प्रक्रिया के तहत लिया गया? क्या वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से बयान दर्ज किया गया, और यदि हां, तो क्या उसका कोई आधिकारिक रिकॉर्ड, अनुमति और प्रमाण मौजूद है? या फिर यह बयान कागज़ों में दिखाने के लिए दर्ज किया गया?
यदि बिना कानूनी प्रक्रिया के किसी विदेश में रह रहे व्यक्ति का बयान दर्ज किया गया है, तो यह न केवल जांच की निष्पक्षता पर सवाल खड़ा करता है, बल्कि पूरे प्रशासनिक तंत्र की विश्वसनीयता को भी प्रभावित करता है।
3. बैंक खाता फ्रीज करने की प्रक्रिया में क्या नियमों का पालन किया गया?
भारतीय बैंकिंग नियमों के अनुसार किसी भी खाताधारक का बैंक खाता फ्रीज करना एक गंभीर कार्रवाई होती है, जिसे केवल ठोस कारणों, लिखित आदेश और सक्षम प्राधिकारी की अनुमति के बाद ही किया जा सकता है। इस मामले में आरोप है कि अंश निषाद का खाता वर्ष 2022 में फ्रीज किया गया, जबकि शिकायतों और लेन-देन की तारीखों में भारी विरोधाभास सामने आया है।
कहीं कहा गया कि पैसा 2022 में भेजा ही नहीं गया, तो कहीं 2024 में यह दावा किया गया कि पैसा “गलती से भेजा गया था।” ऐसे में सवाल उठता है कि बैंक ने किस आधार पर खाते को फ्रीज किया? क्या खाताधारक को समय पर नोटिस दिया गया? क्या उन्हें अपना पक्ष रखने का मौका मिला?
यदि बैंक अधिकारियों ने बिना पूरी जांच और कानूनी आदेश के खाता फ्रीज किया, तो यह सीधे-सीधे बैंकिंग नियमों का उल्लंघन माना जा सकता है और इसमें संबंधित अधिकारियों की जवाबदेही तय होनी चाहिए।
4. पुलिस और बैंक अधिकारियों की भूमिका की निष्पक्ष जांच कब होगी?
पूरे मामले में सबसे बड़ी चिंता यह है कि शिकायतें बार-बार दिए जाने के बावजूद अब तक किसी स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच की घोषणा नहीं हुई है। जब आरोप पुलिस विभाग, बैंक अधिकारियों और कुछ प्रभावशाली व्यक्तियों की मिलीभगत से जुड़े हों, तब स्थानीय स्तर की जांच पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
प्रश्न यह भी है कि क्या इस मामले की जांच वही अधिकारी कर रहे हैं जिन पर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष आरोप लगे हैं? यदि ऐसा है, तो जांच की निष्पक्षता कैसे सुनिश्चित की जाएगी? सामाजिक संगठनों और स्थानीय नागरिकों का कहना है कि जब तक उच्च स्तरीय या बाहरी एजेंसी से जांच नहीं होती, तब तक सच्चाई सामने आना मुश्किल है।
क्या है मांग?
1. पूरे मामले की उच्च स्तरीय न्यायिक जांच
शिकायतकर्ता और उनके समर्थकों की पहली और प्रमुख मांग यह है कि इस पूरे प्रकरण की उच्च स्तरीय न्यायिक जांच कराई जाए। ऐसी जांच किसी सेवानिवृत्त न्यायाधीश या स्वतंत्र एजेंसी से हो, ताकि पुलिस और प्रशासनिक दबाव से मुक्त होकर तथ्यों की पड़ताल की जा सके।
न्यायिक जांच से यह स्पष्ट हो सकेगा कि बैंक खाता फ्रीज करने, बयान दर्ज करने और चालान करने में कहां-कहां नियमों का उल्लंघन हुआ।
2. दोषी पाए जाने पर संबंधित अधिकारियों पर सख्त कार्रवाई
यदि जांच में यह साबित होता है कि पुलिस या बैंक अधिकारियों ने अपने पद का दुरुपयोग किया, तो उनके खिलाफ विभागीय और कानूनी कार्रवाई की जानी चाहिए। केवल निलंबन ही नहीं, बल्कि आवश्यक होने पर आपराधिक मुकदमा भी दर्ज किया जाए, ताकि भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो।
यह मांग इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यदि अधिकारियों को संरक्षण मिलता रहा, तो आम नागरिकों का सिस्टम से भरोसा पूरी तरह टूट जाएगा।
3. शिकायतकर्ता को निष्पक्ष सुनवाई और सुरक्षा
शिकायतकर्ता अंश निषाद को न केवल निष्पक्ष सुनवाई, बल्कि सुरक्षा भी उपलब्ध कराई जाए। आरोप है कि इस पूरे प्रकरण के दौरान उन्हें मानसिक रूप से प्रताड़ित किया गया और बार-बार कानूनी दबाव में डाला गया।
रिपोर्ट : कोटो न्यूज़ नेटवर्क (KNN) |