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RTI आवेदन को लेकर जिलाधिकारी कार्यालय गोरखपुर पर सवाल, आवेदक ने PIO पर सूचना न देने का लगाया आरोप

लोक सूचना अधिकारी (PIO) Girish Kumar Singh

भारत, 29 जनवरी 2026| गोरखपुर जिले के जिलाधिकारी कार्यालय से जुड़े एक सूचना का अधिकार (RTI) आवेदन को लेकर विवाद सामने आया है। वाद संख्या 837/24 से संबंधित सूचना मांगने वाले एक किशोर आवेदक ने आरोप लगाया है कि जिलाधिकारी कार्यालय गोरखपुर में तैनात लोक सूचना अधिकारी (PIO) Girish Kumar Singh ने उन्हें भ्रामक जानकारी देकर गुमराह किया तथा RTI Act 2005 के प्रावधानों का समुचित पालन नहीं किया।

आवेदक का कहना है कि उन्होंने RTI Act 2005 के तहत विधिवत आवेदन प्रस्तुत किया था, जिसमें स्पष्ट रूप से यह भी उल्लेख किया गया था कि यदि मांगी गई सूचना का कोई भाग PIO के कार्यालय से संबंधित न हो, तो उसे धारा 6(3) के अंतर्गत संबंधित विभाग को 7 दिवस के भीतर स्थानांतरित किया जाए।

किशोर आवेदक के अनुसार, उनके द्वारा मांगी गई सूचना का संबंध कई विभागों से था, लेकिन इसके बावजूद न तो पूर्ण सूचना उपलब्ध कराई गई और न ही सूचना को अन्य संबंधित विभागों को समयबद्ध तरीके से स्थानांतरित किया गया। आवेदक का दावा है कि PIO द्वारा दी गई जानकारी अधूरी और भ्रमित करने वाली थी, जिससे उनका सूचना प्राप्त करने का अधिकार प्रभावित हुआ।

RTI Act 2005 की धारा 6(3) स्पष्ट रूप से यह प्रावधान करती है कि यदि कोई सूचना किसी अन्य लोक प्राधिकरण से संबंधित हो, तो संबंधित PIO को आवेदन पांच से सात कार्य दिवसों के भीतर उस प्राधिकरण को स्थानांतरित करना अनिवार्य है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस प्रावधान का उद्देश्य नागरिकों को सूचना प्राप्त करने में अनावश्यक बाधाओं से बचाना है।

किशोर आवेदक ने आरोप लगाया है कि इस मामले में न केवल समयसीमा का उल्लंघन हुआ, बल्कि उन्हें यह भी स्पष्ट नहीं बताया गया कि कौन-सी सूचना किस विभाग से संबंधित है। आवेदक का कहना है कि इससे यह संदेह उत्पन्न होता है कि RTI प्रक्रिया को जानबूझकर जटिल बनाया गया।

हालांकि, इस पूरे मामले में अब तक जिलाधिकारी कार्यालय या संबंधित PIO की ओर से कोई औपचारिक लिखित प्रतिक्रिया सार्वजनिक रूप से सामने नहीं आई है। प्रशासनिक सूत्रों के अनुसार, यदि शिकायत औपचारिक रूप से उच्च अधिकारियों या राज्य सूचना आयोग तक पहुंचती है, तो मामले की जांच की जा सकती है।

क्या कहता है RTI Act 2005

सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 भारत के नागरिकों को शासन-प्रशासन की कार्यप्रणाली में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने के उद्देश्य से लागू किया गया एक महत्वपूर्ण कानून है। इस अधिनियम की कुछ प्रमुख धाराएँ, जो आम नागरिकों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं, निम्नलिखित हैं—

धारा 6(1): नागरिक को सूचना मांगने का अधिकार

RTI Act 2005 की धारा 6(1) के अंतर्गत देश का कोई भी नागरिक किसी भी लोक प्राधिकरण से लिखित या इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से सूचना मांग सकता है। इसके लिए आवेदक को यह बताने की आवश्यकता नहीं होती कि वह सूचना क्यों मांग रहा है या उसका उद्देश्य क्या है।

यह धारा नागरिकों को यह अधिकार देती है कि वे सरकारी कार्यालयों में उपलब्ध अभिलेखों, दस्तावेजों, नोटशीट, आदेशों, पत्राचार, रिपोर्टों तथा निर्णयों से संबंधित जानकारी प्राप्त कर सकें। सूचना मांगने के लिए केवल निर्धारित आवेदन शुल्क जमा करना होता है और आवेदन सरल भाषा में दिया जा सकता है।

धारा 6(3): संबंधित न होने पर सूचना का स्थानांतरण अनिवार्य

धारा 6(3) RTI Act की एक अत्यंत महत्वपूर्ण धारा मानी जाती है। इसके अनुसार, यदि किसी लोक सूचना अधिकारी (PIO) को यह प्रतीत होता है कि मांगी गई सूचना पूरी तरह या आंशिक रूप से उसके कार्यालय से संबंधित नहीं है, तो यह उसका कानूनी दायित्व है कि वह उस आवेदन को 5 से 7 कार्य दिवसों के भीतर संबंधित लोक प्राधिकरण या विभाग को स्थानांतरित करे।

इस स्थानांतरण की सूचना आवेदक को भी देना अनिवार्य है, ताकि उसे यह पता चल सके कि उसकी सूचना अब किस विभाग के पास लंबित है। विशेषज्ञों का कहना है कि इस धारा का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि आम नागरिक को अलग-अलग कार्यालयों के चक्कर न काटने पड़ें और सूचना प्राप्त करने की प्रक्रिया सरल बनी रहे।

धारा 7(1): 30 दिनों के भीतर सूचना देना आवश्यक

RTI Act 2005 की धारा 7(1) के अनुसार, लोक सूचना अधिकारी को आवेदन प्राप्त होने की तिथि से अधिकतम 30 दिनों के भीतर मांगी गई सूचना उपलब्ध करानी होती है या विधिसम्मत कारण बताते हुए उसे अस्वीकार करना होता है।

यदि सूचना जीवन या स्वतंत्रता से संबंधित हो, तो यह समयसीमा घटकर 48 घंटे हो जाती है। समयसीमा का पालन न करने की स्थिति में इसे अधिनियम का उल्लंघन माना जाता है, जिसके लिए संबंधित अधिकारी पर राज्य सूचना आयोग द्वारा आर्थिक दंड तथा विभागीय कार्रवाई भी की जा सकती है।

 

प्रश्न 1: यह मामला किससे संबंधित है?

उत्तर:
यह मामला गोरखपुर जिले के जिलाधिकारी कार्यालय से जुड़े एक सूचना का अधिकार (RTI) आवेदन से संबंधित है। वाद संख्या 837/24 के तहत एक किशोर आवेदक ने आरोप लगाया है कि उन्हें मांगी गई सूचना सही ढंग से उपलब्ध नहीं कराई गई और RTI Act 2005 की प्रक्रिया का समुचित पालन नहीं हुआ।

प्रश्न 2: आवेदक ने किस अधिकारी पर आरोप लगाया है?

उत्तर:
आवेदक का आरोप है कि जिलाधिकारी कार्यालय गोरखपुर में तैनात लोक सूचना अधिकारी (PIO) Girish Kumar Singh ने उन्हें भ्रामक और अधूरी जानकारी दी, जिससे उनका सूचना प्राप्त करने का अधिकार प्रभावित हुआ।

प्रश्न 3: RTI आवेदन में मुख्य आपत्ति क्या है?

उत्तर:
आवेदक का कहना है कि उनके द्वारा मांगी गई सूचना कई विभागों से संबंधित थी, लेकिन न तो पूरी सूचना दी गई और न ही RTI Act 2005 की धारा 6(3) के अंतर्गत आवेदन को संबंधित विभागों को समय पर स्थानांतरित किया गया।

प्रश्न 4: RTI Act 2005 की धारा 6(3) क्या कहती है?

उत्तर:
धारा 6(3) के अनुसार, यदि मांगी गई सूचना किसी अन्य लोक प्राधिकरण से संबंधित हो, तो संबंधित PIO का यह कानूनी दायित्व है कि वह आवेदन को 5 से 7 कार्य दिवसों के भीतर उस विभाग को स्थानांतरित करे और इसकी सूचना आवेदक को भी दे।

प्रश्न 5: सूचना देने की समयसीमा क्या होती है?

उत्तर:
RTI Act 2005 की धारा 7(1) के तहत PIO को आवेदन प्राप्त होने की तारीख से अधिकतम 30 दिनों के भीतर सूचना उपलब्ध करानी होती है। जीवन और स्वतंत्रता से जुड़े मामलों में यह समयसीमा 48 घंटे होती है।

प्रश्न 6: यदि समय पर सूचना न मिले तो क्या होता है?

उत्तर:
यदि PIO समयसीमा का पालन नहीं करता या बिना वैध कारण के सूचना रोकता है, तो इसे RTI Act का उल्लंघन माना जाता है। ऐसे मामलों में राज्य सूचना आयोग संबंधित अधिकारी पर आर्थिक दंड और विभागीय कार्रवाई कर सकता है।

प्रश्न 7: क्या आवेदक को बताया जाना जरूरी है कि सूचना किस विभाग में भेजी गई?

उत्तर:
हाँ। RTI Act के अनुसार, जब आवेदन धारा 6(3) के अंतर्गत स्थानांतरित किया जाता है, तो आवेदक को यह स्पष्ट रूप से बताया जाना अनिवार्य है कि उसकी सूचना अब किस विभाग के पास लंबित है।

प्रश्न 8: इस मामले में प्रशासन का क्या पक्ष है?

उत्तर:
अब तक जिलाधिकारी कार्यालय या संबंधित PIO की ओर से कोई औपचारिक लिखित प्रतिक्रिया सार्वजनिक रूप से सामने नहीं आई है। प्रशासनिक सूत्रों के अनुसार, यदि शिकायत उच्च अधिकारियों या राज्य सूचना आयोग तक पहुंचती है, तो जांच संभव है।

प्रश्न 9: इस मामले का आगे क्या परिणाम हो सकता है?

उत्तर:
यदि आवेदक राज्य सूचना आयोग में अपील या शिकायत दर्ज करता है और आरोप प्रथम दृष्टया सही पाए जाते हैं, तो आयोग द्वारा जांच, निर्देश और दंडात्मक कार्रवाई की जा सकती है।

प्रश्न 10: आम नागरिक इस मामले से क्या सीख ले सकते हैं?

उत्तर:
यह मामला दर्शाता है कि RTI Act 2005 नागरिकों के लिए एक सशक्त कानून है, लेकिन इसके प्रभावी क्रियान्वयन के लिए नागरिकों को अपने अधिकारों और समयसीमा की जानकारी होना अत्यंत आवश्यक है।

रिपोर्ट : कोटो न्यूज़ नेटवर्क (KNN) |

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