कोटो फेडरेशन,16 जनवरी 2026 | भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास केवल 1857 की क्रांति या बड़े राजनीतिक आंदोलनों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसकी जड़ें उन आदिवासी संघर्षों में भी गहराई से समाई हुई हैं, जिन्होंने अंग्रेजी सत्ता की नींव को हिला दिया था। ऐसे ही संघर्षों के अग्रदूत और प्रतीक पुरुष थे तिलका मांझी, जिन्हें इतिहास का पहला आदिवासी स्वतंत्रता सेनानी माना जाता है। झारखंड के संथाल परगना क्षेत्र से उठे इस महान योद्धा ने 1784 में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के अत्याचारों के खिलाफ सशस्त्र विद्रोह का बिगुल फूंका।
आज उनके बलिदान दिवस पर संपूर्ण राष्ट्र उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित कर रहा है। तिलका मांझी का जीवन केवल एक आदिवासी योद्धा की गाथा नहीं, बल्कि अन्याय, शोषण और दमन के विरुद्ध खड़े होने की प्रेरणादायक कहानी है। उन्होंने उस दौर में अंग्रेजों को चुनौती दी, जब भारत के अधिकांश हिस्सों में ब्रिटिश सत्ता मजबूत होती जा रही थी।
तिलका मांझी का प्रारंभिक जीवन और पृष्ठभूमि
तिलका मांझी का जन्म 11 फरवरी 1750 को वर्तमान झारखंड राज्य के दुमका जिले के सुल्तानगंज गांव में एक साधारण संथाल आदिवासी परिवार में हुआ था। उनका वास्तविक नाम जाबरा पहाड़िया बताया जाता है, लेकिन इतिहास में वे तिलका मांझी के नाम से प्रसिद्ध हुए। संथाल और पहाड़िया आदिवासी समाज की परंपराओं, रीति-रिवाजों और प्रकृति से गहरे जुड़ाव के बीच उनका बचपन बीता।
बचपन से ही तिलका मांझी में अदम्य साहस, नेतृत्व क्षमता और न्याय के प्रति गहरी संवेदना दिखाई देती थी। जंगलों में शिकार करना, कठिन परिस्थितियों में जीवित रहना और धनुष-बाण चलाने में वे असाधारण रूप से निपुण थे। कहा जाता है कि वे इतने कुशल तीरंदाज थे कि दूर से ही लक्ष्य को भेद देते थे। आदिवासी समाज में उन्हें एक कुशल योद्धा और स्वाभाविक नेता के रूप में देखा जाने लगा।
ब्रिटिश शोषण और विद्रोह की पृष्ठभूमि
18वीं सदी के उत्तरार्ध में जब ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने बंगाल, बिहार और झारखंड के क्षेत्रों में अपना नियंत्रण बढ़ाना शुरू किया, तब सबसे अधिक शोषण आदिवासी समुदायों का हुआ। अंग्रेजों ने जमींदारी प्रथा, भारी लगान, जबरन वसूली और स्थानीय मुखियाओं को हटाकर बाहरी अधिकारियों की नियुक्ति शुरू कर दी।
संथाल परगना और पहाड़िया क्षेत्रों में रहने वाले आदिवासी सदियों से जंगल, जमीन और नदियों पर निर्भर थे। अंग्रेजी नीतियों ने उनकी आजीविका छीन ली। अत्यधिक कर, बेगार प्रथा और दमनकारी कानूनों के कारण आदिवासी समाज में असंतोष फैलने लगा। इसी असंतोष ने तिलका मांझी जैसे योद्धा को विद्रोह का रास्ता अपनाने के लिए प्रेरित किया।
तिलका मांझी ने महसूस किया कि यदि समय रहते अंग्रेजों का विरोध नहीं किया गया, तो आदिवासी समाज पूरी तरह गुलामी की जंजीरों में जकड़ जाएगा। उन्होंने अपने क्षेत्र के युवाओं को संगठित करना शुरू किया और जंगलों को ही अपना रणक्षेत्र बना लिया।
1784 का सशस्त्र विद्रोह और क्रांतिकारी गतिविधियां
वर्ष 1784 में तिलका मांझी ने ब्रिटिश शासन के विरुद्ध पहला संगठित सशस्त्र आदिवासी विद्रोह शुरू किया। यह वह समय था जब अंग्रेजों के खिलाफ खुलेआम हथियार उठाना असाधारण साहस का काम था। तिलका मांझी ने गुरिल्ला युद्ध की रणनीति अपनाई और जंगलों में रहकर अंग्रेजी फौजों को चुनौती दी।
इतिहासकारों के अनुसार, तिलका मांझी ने भागलपुर के तत्कालीन ब्रिटिश कलेक्टर ऑगस्टस क्लीवलैंड को अपने तीर से मार गिराया था। यह घटना अंग्रेजों के लिए बड़ा झटका थी और इससे ब्रिटिश प्रशासन में भय का माहौल बन गया। तिलका मांझी की लोकप्रियता तेजी से बढ़ने लगी और बड़ी संख्या में आदिवासी उनके साथ जुड़ने लगे।
उनका आंदोलन केवल हिंसक प्रतिरोध तक सीमित नहीं था, बल्कि यह आदिवासी अस्मिता, स्वाभिमान और आत्मनिर्भरता की लड़ाई थी। वे अपने लोगों को यह विश्वास दिलाते थे कि अंग्रेज अजेय नहीं हैं और संगठित होकर उन्हें हराया जा सकता है।
गिरफ्तारी, शहादत और ऐतिहासिक महत्व
ब्रिटिश सरकार तिलका मांझी की बढ़ती ताकत से घबरा गई थी। उन्हें पकड़ने के लिए व्यापक अभियान चलाया गया। कई वर्षों तक संघर्ष के बाद अंततः तिलका मांझी को धोखे से गिरफ्तार कर लिया गया। 13 जनवरी 1785 को भागलपुर में उन्हें अमानवीय तरीके से फांसी दी गई। कहा जाता है कि उन्हें बरगद के पेड़ से लटका कर शहीद किया गया।
तिलका मांझी की शहादत ने आदिवासी समाज के भीतर स्वतंत्रता की चिंगारी को और प्रज्वलित कर दिया। उनके बलिदान ने आगे चलकर संथाल हूल (1855), बिरसा मुंडा के उलगुलान और अन्य आदिवासी आंदोलनों को प्रेरणा दी। वे भारत के स्वतंत्रता संग्राम के उन गुमनाम नायकों में से हैं, जिनका योगदान लंबे समय तक मुख्यधारा के इतिहास में उपेक्षित रहा।
तिलका मांझी : विस्तृत परिचय और ऐतिहासिक महत्व
तिलका मांझी भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के उन आरंभिक नायकों में शामिल हैं, जिनका नाम इतिहास के पन्नों में लंबे समय तक उपेक्षित रहा, लेकिन जिनका योगदान अत्यंत क्रांतिकारी और दूरगामी प्रभाव वाला था। वे न केवल पहले आदिवासी स्वतंत्रता सेनानी थे, बल्कि ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के विरुद्ध संगठित सशस्त्र प्रतिरोध करने वाले भारत के प्रथम योद्धाओं में भी गिने जाते हैं। उनका जीवन आदिवासी स्वाभिमान, संघर्ष, साहस और बलिदान का जीवंत प्रतीक है।
जन्म और प्रारंभिक जीवन
तिलका मांझी का जन्म 11 फरवरी 1750 को वर्तमान झारखंड राज्य के दुमका जिले के सुल्तानगंज क्षेत्र में हुआ था। वे एक साधारण किंतु स्वाभिमानी संथाल / पहाड़िया आदिवासी परिवार से संबंध रखते थे। उनका वास्तविक नाम जाबरा पहाड़िया बताया जाता है, जबकि “मांझी” आदिवासी समाज में मुखिया या नेता के लिए प्रयुक्त उपाधि थी।
बचपन से ही तिलका मांझी प्रकृति, जंगल, पहाड़ और नदियों के बीच पले-बढ़े। यही कारण था कि उनमें शारीरिक दृढ़ता, आत्मनिर्भरता और संघर्षशीलता स्वाभाविक रूप से विकसित हुई। वे संथाल समाज की परंपराओं, लोकविश्वासों और सामूहिक जीवन मूल्यों से गहराई से जुड़े हुए थे।
साहस, नेतृत्व और आदिवासी चेतना
युवा अवस्था में ही तिलका मांझी एक असाधारण धनुर्धर और कुशल योद्धा के रूप में प्रसिद्ध हो गए थे। जंगलों में शिकार, आत्मरक्षा और रणनीतिक युद्ध कला में उन्हें महारत हासिल थी। उनके भीतर अन्याय के प्रति तीव्र विरोध और अपने समाज के प्रति गहरी जिम्मेदारी की भावना थी।
ब्रिटिश शासन के आगमन के साथ जब आदिवासी क्षेत्रों में अत्यधिक कर, बेगार प्रथा और जमींदारी शोषण बढ़ा, तब तिलका मांझी ने इसका खुलकर विरोध किया। उन्होंने आदिवासी युवाओं को संगठित कर यह संदेश दिया कि जल, जंगल और जमीन पर पहला अधिकार आदिवासियों का है, न कि विदेशी शासकों का।
1784 का पहला आदिवासी सशस्त्र विद्रोह
वर्ष 1784 भारतीय इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ माना जाता है। इसी वर्ष तिलका मांझी ने ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के विरुद्ध पहला संगठित आदिवासी सशस्त्र विद्रोह शुरू किया। यह विद्रोह उस समय हुआ, जब अंग्रेजी सत्ता अपने विस्तार के चरम पर थी और उनके खिलाफ हथियार उठाना अत्यंत जोखिम भरा था।
तिलका मांझी ने गुरिल्ला युद्ध रणनीति अपनाई और जंगलों को अपना किला बना लिया। उन्होंने अंग्रेजी चौकियों, कर वसूली केंद्रों और अधिकारियों पर अचानक हमले कर ब्रिटिश प्रशासन को हिला दिया। कहा जाता है कि उन्होंने भागलपुर के ब्रिटिश अधिकारी ऑगस्टस क्लीवलैंड को तीर मारकर मौत के घाट उतार दिया था, जिससे अंग्रेजी शासन में खलबली मच गई।
गिरफ्तारी और शहादत
तिलका मांझी की बढ़ती लोकप्रियता और विद्रोह से घबराकर अंग्रेजों ने उन्हें पकड़ने के लिए बड़ा अभियान चलाया। अंततः विश्वासघात और छल के माध्यम से उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया।
13 जनवरी 1785 को भागलपुर में उन्हें अमानवीय तरीके से फांसी दे दी गई। लोककथाओं के अनुसार, उन्हें बरगद के वृक्ष से लटकाकर शहीद किया गया। यह केवल एक व्यक्ति की मृत्यु नहीं थी, बल्कि आदिवासी स्वाभिमान और स्वतंत्रता चेतना का बलिदान था।
पहचान और ऐतिहासिक महत्व
तिलका मांझी को आज भारत का प्रथम आदिवासी स्वतंत्रता सेनानी माना जाता है। उनका संघर्ष 1857 की क्रांति से भी कई दशक पहले शुरू हुआ था, जिससे यह स्पष्ट होता है कि भारत में स्वतंत्रता की चेतना बहुत पहले ही जाग चुकी थी।
उनकी शहादत ने आगे चलकर संथाल हूल (1855), बिरसा मुंडा के उलगुलान और अन्य आदिवासी आंदोलनों को प्रेरणा दी। आज तिलका मांझी आदिवासी अधिकारों, आत्मसम्मान और प्रतिरोध के प्रतीक बन चुके हैं।
रिपोर्ट : कोटो न्यूज़ नेटवर्क (KNN) |

