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विनोद कुमार साहनी ने विजयादशमी दीपावली और छठ पर्व पर दी शुभकामनाएं

नेपाल निषाद परिषद के वरिष्ठ उपाध्यक्ष विनोद कुमार साहनी

नेपाल निषाद परिषद के वरिष्ठ उपाध्यक्ष विनोद कुमार साहनी

संवादाताः कोटो न्यूज़ नेटवर्क (KNN) | नेपाल निषाद परिषद, लुम्बिनी प्रदेश के वरिष्ठ उपाध्यक्ष विनोद कुमार साहनी ने विजयादशमी, महान हिन्दू त्यौहार दीपावली और लोकआस्था के पर्व छठ महापर्व की पूर्व संध्या पर समस्त देशवासियों एवं विदेश में बसे लोगों को हार्दिक शुभकामनाएं दी हैं। उन्होंने कहा कि यह पर्व केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं बल्कि हमारी सांस्कृतिक पहचान, एकता और सद्भावना का प्रतीक है। साहनी ने अपने संदेश में कहा कि विजयादशमी बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक है, जो हमें यह सीख देता है कि सत्य और धर्म की शक्ति सदा अडिग रहती है। दीपावली हमें अंधकार से प्रकाश की ओर बढ़ने और समाज में समरसता फैलाने का संदेश देती है, वहीं छठ महापर्व प्रकृति, पर्यावरण और लोकआस्था के सामंजस्य का अनुपम उदाहरण है। उन्होंने बताया कि इन पर्वों का महत्व केवल धार्मिक दृष्टिकोण से नहीं है बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक एकता में भी इसकी गहरी भूमिका है। विनोद कुमार साहनी ने कहा कि नेपाल और भारत में साझा संस्कृति और परंपरा की वजह से ये त्योहार दोनों देशों के बीच आपसी भाईचारा और मित्रता को मजबूत करते हैं। विशेष रूप से छठ पर्व, जो सूर्योपासना का महान अनुष्ठान है, बिहार, उत्तर प्रदेश, झारखंड और नेपाल के तराई क्षेत्र में रहने वाले करोड़ों लोगों की आस्था का केंद्र है। यह पर्व नदी-तालाबों के तट पर सामूहिक रूप से मनाया जाता है और लोगों को स्वच्छता, संयम और त्याग का संदेश देता है। उन्होंने यह भी अपील की कि इन त्योहारों पर लोग केवल धार्मिक आस्था तक सीमित न रहें, बल्कि समाज में स्वच्छता, शिक्षा, पर्यावरण संरक्षण और भाईचारा बढ़ाने के लिए भी कदम उठाएं। साहनी ने विशेष रूप से युवाओं से आग्रह किया कि वे आधुनिकता के साथ-साथ परंपराओं को भी अपनाएं और समाज को नई दिशा देने का काम करें।

विजयादशमी: बुराई पर अच्छाई की विजय

विजयादशमी, जिसे दशहरा भी कहा जाता है, भारतीय उपमहाद्वीप के सबसे प्राचीन और व्यापक रूप से मनाए जाने वाले पर्वों में से एक है। यह पर्व हमें सदियों पुराना संदेश देता है कि चाहे बुराई कितनी भी शक्तिशाली क्यों न हो, अंततः अच्छाई की विजय अवश्य होती है। रामायण की कथा के अनुसार भगवान राम ने इसी दिन रावण का वध किया था और माता सीता को मुक्त कराया था। इस घटना ने संपूर्ण मानव समाज को यह शिक्षा दी कि असत्य और अन्याय टिक नहीं सकते, जबकि सत्य और धर्म की जीत निश्चित है।

आज के दौर में विजयादशमी केवल धार्मिक अनुष्ठान तक सीमित नहीं रह गया है। यह पर्व हमें सामाजिक और व्यक्तिगत जीवन में भी प्रेरणा देता है। जब हम अपने जीवन की बुराइयों—जैसे कि अहंकार, आलस्य, लालच, नशा और अन्य सामाजिक बुराइयों—को दूर करने का संकल्प लेते हैं, तभी वास्तविक अर्थों में विजयादशमी का पालन होता है। रावण दहन के प्रतीक से हमें यह याद दिलाया जाता है कि हर इंसान को अपने भीतर के रावण को जलाना होगा।

दीपावली प्रकाश का पर्व, अंधकार से मुक्ति

दीपावली, जिसे ‘दीपो का त्योहार’ कहा जाता है, अंधकार पर प्रकाश की विजय का प्रतीक है। इस दिन घर-घर दीपक जलाए जाते हैं, आतिशबाज़ी की जाती है और लोग अपने परिवार तथा मित्रों के साथ उल्लासपूर्वक इस पर्व का आनंद उठाते हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार, भगवान राम 14 वर्षों के वनवास और रावण वध के बाद अयोध्या लौटे थे। अयोध्यावासियों ने उनके स्वागत में दीप जलाकर नगर को आलोकित किया था।

आधुनिक संदर्भ में दीपावली हमें यह प्रेरणा देती है कि जीवन के अंधकार—अज्ञान, निराशा और नकारात्मकता—को दूर करके ज्ञान, उत्साह और सकारात्मकता का प्रकाश फैलाएं। दीपावली केवल दीप जलाने का पर्व नहीं, बल्कि यह अपने हृदय में करुणा, प्रेम और सहयोग का दीप जलाने का संदेश देती है।

साथ ही, यह पर्व आर्थिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है। इस समय व्यापार, रोजगार और बाजारों में रौनक बढ़ जाती है। परिवारों में मेल-मिलाप होता है, रिश्तों में गर्मजोशी आती है और समाज में खुशहाली का वातावरण बनता है।

छठ महापर्व सूर्योपासना, स्वच्छता और संयम का प्रतीक

छठ महापर्व भारतीय संस्कृति का वह अनमोल अध्याय है, जो सूर्योपासना और प्रकृति-पूजा का सबसे उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत करता है। यह पर्व विशेष रूप से बिहार, उत्तर प्रदेश, झारखंड और नेपाल के तराई क्षेत्रों में मनाया जाता है, लेकिन आज इसकी लोकप्रियता देश-विदेश तक फैल चुकी है।

छठ व्रत में श्रद्धालु 36 घंटे तक निर्जल उपवास रखते हैं और डूबते व उगते सूर्य को अर्घ्य अर्पित करते हैं। यह पर्व केवल आस्था का ही नहीं बल्कि अनुशासन, संयम और आत्मशक्ति का परिचायक है। छठ पूजा में इस्तेमाल होने वाली सामग्रियां पूरी तरह प्राकृतिक और शुद्ध होती हैं—जैसे गन्ना, गुड़, फल और मिट्टी के दीये। इससे यह पर्व पर्यावरण संरक्षण और स्वास्थ्य संवर्धन का भी संदेश देता है।

इसके अलावा, छठ पूजा सामूहिकता का भी प्रतीक है। परिवार और समाज के लोग मिलकर घाट की सफाई करते हैं, व्रतियों की सेवा करते हैं और नदी-तालाब के किनारे सामूहिक आस्था का वातावरण बनाते हैं। इस तरह यह पर्व सामाजिक एकता और स्वच्छता दोनों को मजबूती देता है।

समाज में सद्भावना बढ़ाएं

हर त्योहार का असली उद्देश्य केवल पूजा-पाठ नहीं, बल्कि समाज में एकता और भाईचारा बढ़ाना है। विजयादशमी, दीपावली और छठ महापर्व तीनों हमें यही संदेश देते हैं कि इंसानियत सबसे बड़ा धर्म है। जाति, धर्म या क्षेत्र की सीमाओं से परे जाकर जब लोग एक-दूसरे को शुभकामनाएं देते हैं और साथ मिलकर पर्व मनाते हैं, तभी सच्चे अर्थों में समाज में सद्भावना का प्रसार होता है।

आज के समय में जब विभाजन और तनाव की घटनाएं सामने आती हैं, तब इन पर्वों की प्रासंगिकता और बढ़ जाती है। पर्व हमें यह सिखाते हैं कि मतभेद भले हों, लेकिन मनभेद नहीं होने चाहिए। त्योहारों के अवसर पर साझा भोज, सामूहिक पूजा और परस्पर संवाद से समाज में आपसी विश्वास मजबूत होता है।

स्वच्छता और पर्यावरण पर ध्यान दें

विनोद कुमार साहनी और समाज के अनेक बुद्धिजीवी यह मानते हैं कि त्योहार मनाने का तरीका ऐसा होना चाहिए, जिससे प्रकृति और पर्यावरण को नुकसान न पहुँचे। दीपावली के दौरान जहां-जहां पटाखों से प्रदूषण फैलता है, वहीं छठ महापर्व स्वच्छता और शुद्धता का उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत करता है।

इसलिए जरूरी है कि लोग दीपावली जैसे पर्व को हरियाली दीपावली बनाएं, पर्यावरण को बचाएं और बच्चों को पटाखों की बजाय दीयों और रोशनी से खुशी मनाने के लिए प्रेरित करें। इसी प्रकार छठ पूजा के समय जलाशयों को गंदा करने की बजाय उन्हें और स्वच्छ बनाना हमारी जिम्मेदारी है। जब त्योहारों के साथ पर्यावरण संरक्षण जुड़ जाएगा, तब यह पर्व और भी पवित्र और प्रेरणादायी बन जाएंगे।

युवाओं को परंपरा और आधुनिकता का संगम अपनाना चाहिए

समाज का भविष्य युवाओं के हाथ में है। आधुनिक शिक्षा, तकनीक और वैश्विक दृष्टिकोण के बीच अगर युवा अपनी परंपराओं से जुड़कर चलें तो वे समाज को नई दिशा दे सकते हैं। विजयादशमी युवाओं को साहस और सत्य के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देती है, दीपावली उन्हें सकारात्मक सोच और उत्साह का दीप जलाने का संदेश देती है और छठ महापर्व अनुशासन, संयम और प्रकृति-प्रेम का उदाहरण प्रस्तुत करता है।

रिपोर्ट : कोटो न्यूज़ नेटवर्क (KNN)

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