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UP News | निषाद समाज की उपजातियों को SC में शामिल करने की मांग तेज, मुख्यमंत्री को सौंपा

पूर्वांचल ,गोरखपुर 13 जनवरी 2026| उत्तर प्रदेश में निषाद समाज को अनुसूचित जाति का दर्जा दिए जाने की मांग एक बार फिर जोर पकड़ने लगी है। निषाद समाज की उपजातियों—केवट, मल्लाह, बिंद, कश्यप, बाथम, धीवर आदि—को अनुसूचित जाति (SC) में शामिल कर प्रमाण पत्र जारी किए जाने को लेकर निषाद युवा वाहिनी ने मुख्यमंत्री उत्तर…

पूर्वांचल ,गोरखपुर 13 जनवरी 2026| उत्तर प्रदेश में निषाद समाज को अनुसूचित जाति का दर्जा दिए जाने की मांग एक बार फिर जोर पकड़ने लगी है। निषाद समाज की उपजातियों—केवट, मल्लाह, बिंद, कश्यप, बाथम, धीवर आदि—को अनुसूचित जाति (SC) में शामिल कर प्रमाण पत्र जारी किए जाने को लेकर निषाद युवा वाहिनी ने मुख्यमंत्री उत्तर प्रदेश को ज्ञापन सौंपा है। यह ज्ञापन मंडलायुक्त गोरखपुर के माध्यम से भेजा गया।

संगठन ने मांग की है कि दिल्ली और पश्चिम बंगाल की तर्ज पर उत्तर प्रदेश में भी निषाद समाज को अनुसूचित जाति का संवैधानिक लाभ दिया जाए, जिससे समाज का सर्वांगीण विकास संभव हो सके।

निषाद समाज का ऐतिहासिक और सामाजिक पक्ष

ज्ञापन में उल्लेख किया गया है कि निषाद समाज भारत की सबसे प्राचीन जातियों में से एक है। केवट, मल्लाह, बिंद, कश्यप, बाथम, धीवर जैसी उपजातियां देश के अलग-अलग हिस्सों में निवास करती रही हैं। इनकी संस्कृति, परंपरा और आजीविका जल से जुड़ी हुई है।
रामायण और महाभारत जैसे पौराणिक ग्रंथों में निषाद समाज की ऐतिहासिक भूमिका का स्पष्ट उल्लेख मिलता है। इसके बावजूद, आधुनिक सामाजिक व्यवस्था में यह समाज लगातार उपेक्षा का शिकार रहा है।

अंग्रेजी शासन का दमन और आज की हकीकत

निषाद युवा वाहिनी ने ज्ञापन में बताया कि वर्ष 1871 में अंग्रेजी शासन द्वारा लागू किए गए आपराधिक जनजाति अधिनियम के तहत निषाद समाज की कई उपजातियों को जन्मजात अपराधी घोषित कर दिया गया था। इस कानून के कारण इन जातियों पर कठोर प्रतिबंध लगाए गए, जिससे उनका सामाजिक और आर्थिक विकास रुक गया।
हालांकि आजादी के बाद 1952 में इस कानून से मुक्ति मिली, लेकिन दशकों तक चले दमन का असर आज भी दिखाई देता है। शिक्षा, रोजगार और सामाजिक सम्मान के क्षेत्र में निषाद समाज आज भी पिछड़ा हुआ है।

दिल्ली और पश्चिम बंगाल का उदाहरण

निषाद युवा वाहिनी ने अपने ज्ञापन में यह भी उल्लेख किया कि दिल्ली और पश्चिम बंगाल सरकारें पहले ही निषाद समाज की इन उपजातियों को अनुसूचित जाति में शामिल कर चुकी हैं और वहां SC प्रमाण पत्र जारी किए जा रहे हैं।
इन राज्यों में निषाद समाज को आरक्षण, शिक्षा और सरकारी योजनाओं का सीधा लाभ मिल रहा है। संगठन का कहना है कि जब एक ही समाज को अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग संवैधानिक दर्जा मिल सकता है, तो उत्तर प्रदेश में यह सुविधा क्यों नहीं?

उत्तर प्रदेश में भी समान अधिकार की मांग

निषाद युवा वाहिनी का कहना है कि उत्तर प्रदेश में निषाद समाज की बड़ी आबादी निवास करती है, लेकिन इसके बावजूद उन्हें अनुसूचित जाति का लाभ नहीं मिल पा रहा है। संगठन ने सरकार से मांग की है कि सामाजिक न्याय के सिद्धांत के तहत निषाद समाज को भी वही अधिकार दिए जाएं, जो अन्य राज्यों में मिल रहे हैं।
संगठन ने चेतावनी दी है कि यदि सरकार ने इस मांग पर गंभीरता से विचार नहीं किया, तो निषाद समाज को लोकतांत्रिक तरीके से आंदोलन का रास्ता अपनाना पड़ सकता है।

निषाद युवा वाहिनी के राष्ट्रीय अध्यक्ष सुशील चंद साहनी (एडवोकेट) ने कहा—
“निषाद समाज सदियों से जल कृषि और परिवहन से जुड़ा रहा है और देश के विकास में योगदान देता आया है। इसके बावजूद आज यह समाज सबसे अधिक उपेक्षित है। दिल्ली और पश्चिम बंगाल की तरह यदि उत्तर प्रदेश में भी अनुसूचित जाति का दर्जा दिया जाता है, तो यह ऐतिहासिक अन्याय की भरपाई होगी।”
उन्होंने सरकार से अपील की कि इस विषय को राजनीति से ऊपर उठकर देखा जाए।

 

निषाद समाज लंबे समय से सामाजिक न्याय और संवैधानिक समानता की मांग करता आ रहा है। समाज का कहना है कि ऐतिहासिक रूप से उपेक्षित रहने, अंग्रेजी शासनकाल में आपराधिक जनजाति घोषित किए जाने और आज़ादी के बाद भी समुचित पुनर्वास व विकास न होने के कारण निषाद समाज आज भी शिक्षा, रोजगार और सामाजिक सम्मान के मामले में पिछड़ा हुआ है। इसी पृष्ठभूमि में निषाद समाज ने अपनी प्रमुख मांगों को सरकार के सामने स्पष्ट रूप से रखा है।

सबसे प्रमुख मांग यह है कि निषाद समाज की उपजातियों—केवट, मल्लाह, बिंद, कश्यप, बाथम, धीवर आदि—को अनुसूचित जाति (SC) की श्रेणी में शामिल किया जाए। समाज का तर्क है कि ये सभी उपजातियां सामाजिक, शैक्षणिक और आर्थिक रूप से समान परिस्थितियों में जीवन यापन कर रही हैं तथा इन्हें भी वही संवैधानिक संरक्षण मिलना चाहिए, जो अनुसूचित जातियों को प्राप्त है।

दूसरी महत्वपूर्ण मांग यह है कि उत्तर प्रदेश में निषाद समाज के लोगों को अनुसूचित जाति प्रमाण पत्र जारी किए जाएं। वर्तमान में SC प्रमाण पत्र न मिलने के कारण निषाद समाज के हजारों छात्र-छात्राएं, युवा और जरूरतमंद परिवार सरकारी योजनाओं, छात्रवृत्तियों, आरक्षण लाभ और सामाजिक सुरक्षा योजनाओं से वंचित रह जाते हैं। प्रमाण पत्र जारी होने से शिक्षा, नौकरी और सरकारी सहायता तक उनकी सीधी पहुंच सुनिश्चित होगी।

निषाद समाज की तीसरी बड़ी मांग दिल्ली और पश्चिम बंगाल मॉडल को उत्तर प्रदेश में लागू करने की है। इन दोनों राज्यों में निषाद समाज की उपजातियों को अनुसूचित जाति के अंतर्गत मान्यता दी गई है और वहां के लोगों को इसका वास्तविक लाभ मिल रहा है। समाज का कहना है कि जब एक ही जाति को देश के अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग संवैधानिक दर्जा दिया जा सकता है, तो उत्तर प्रदेश में समान नीति लागू करना सामाजिक समानता के सिद्धांत के अनुरूप होगा।

इसके साथ ही निषाद समाज की यह भी मांग है कि शिक्षा, सरकारी नौकरियों और सभी सामाजिक-आर्थिक कल्याणकारी योजनाओं में उन्हें समान अधिकार दिए जाएं। समाज का मानना है कि आरक्षण और योजनाओं का लाभ मिलने से न केवल उनकी आर्थिक स्थिति मजबूत होगी, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को भी सम्मानजनक जीवन, बेहतर शिक्षा और रोजगार के अवसर प्राप्त होंगे।

रिपोर्ट : कोटो न्यूज़ नेटवर्क (KNN) |

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