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गोरखपुर में निषाद समाज का प्रतिनिधित्व मुद्दा बना भाजपा पर टिकट न देने के आरोप

कोटो महासंघ संवाददाता भारत, 29 अप्रैल 2026 | पूर्वांचल की राजनीति का अहम केंद्र माने जाने वाले गोरखपुर में इन दिनों एक बड़ा राजनीतिक सवाल चर्चा का विषय बना हुआ है—क्या निषाद (केवट/मल्लाह) समाज को उचित राजनीतिक प्रतिनिधित्व मिल रहा है? जनसंख्या और सामाजिक प्रभाव के लिहाज से मजबूत माने जाने वाले इस समाज को…

गोरखपुर में निषाद समाज को सांसद टिकट न मिलने पर उठे सवाल और राजनीतिक बहस

कोटो महासंघ संवाददाता भारत, 29 अप्रैल 2026 | पूर्वांचल की राजनीति का अहम केंद्र माने जाने वाले गोरखपुर में इन दिनों एक बड़ा राजनीतिक सवाल चर्चा का विषय बना हुआ है—क्या निषाद (केवट/मल्लाह) समाज को उचित राजनीतिक प्रतिनिधित्व मिल रहा है? जनसंख्या और सामाजिक प्रभाव के लिहाज से मजबूत माने जाने वाले इस समाज को लेकर अब यह मुद्दा उठाया जा रहा है कि पिछले कई दशकों में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने गोरखपुर लोकसभा सीट से इस समाज के किसी भी उम्मीदवार को टिकट क्यों नहीं दिया।

इस मुद्दे को लेकर सामाजिक संगठनों और स्थानीय नेताओं के बीच बहस तेज हो गई है। खासकर फिशरमैन आर्मी से जुड़े नेताओं और बहुजन राजनीति से जुड़े कार्यकर्ताओं ने इसे सामाजिक न्याय और राजनीतिक भागीदारी से जोड़ते हुए बड़ा सवाल खड़ा किया है। फिशरमैन आर्मी सामाजिक संगठन के प्रदेश अध्यक्ष एवं बहुजन समाज पार्टी (बहुजन समाज पार्टी) से जुड़े नेता राजकपूर निषाद ने इस मुद्दे को सार्वजनिक रूप से उठाते हुए कहा कि गोरखपुर में निषाद समाज की आबादी और राजनीतिक योगदान दोनों ही महत्वपूर्ण हैं, फिर भी उन्हें लोकसभा स्तर पर प्रतिनिधित्व नहीं मिलना गंभीर चिंता का विषय है।

उन्होंने कहा, “पिछले लगभग 50 वर्षों के राजनीतिक इतिहास को देखें तो भाजपा ने इस समाज से किसी भी उम्मीदवार को सांसद का टिकट नहीं दिया। यह केवल एक संयोग नहीं, बल्कि एक बड़ा राजनीतिक सवाल है, जिसका जवाब जनता जानना चाहती है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि गोरखपुर और आसपास के क्षेत्रों में निषाद समाज एक महत्वपूर्ण वोट बैंक के रूप में देखा जाता है। यह समाज नदियों से जुड़े पारंपरिक व्यवसायों के साथ-साथ अब शिक्षा, व्यापार और राजनीति में भी अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज करा रहा है।

इसके बावजूद टिकट वितरण में इस समाज की अनदेखी को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक माना जा रहा है। कुछ विश्लेषकों का यह भी कहना है कि राजनीतिक दल अक्सर जातीय समीकरणों और जीत की संभावनाओं के आधार पर उम्मीदवार तय करते हैं, जिससे कई बार बड़े सामाजिक समूह भी प्रतिनिधित्व से वंचित रह जाते हैं। इस मुद्दे के सामने आने के बाद स्थानीय राजनीति में हलचल तेज हो गई है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर भी यह सवाल तेजी से वायरल हो रहा है, जहां लोग राजनीतिक दलों से जवाब मांग रहे हैं। बहुजन और पिछड़ा वर्ग की राजनीति से जुड़े संगठनों ने इसे सामाजिक न्याय से जोड़ते हुए कहा है कि लोकतंत्र में हर समाज को उसकी जनसंख्या और योगदान के अनुसार भागीदारी मिलनी चाहिए।

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि आने वाले चुनावों में यह मुद्दा एक बड़ा चुनावी एजेंडा बन सकता है और विभिन्न दल इस पर अपनी रणनीति तैयार कर सकते हैं। गोरखपुर की राजनीति में निषाद समाज की भूमिका पहले भी कई बार निर्णायक रही है। ऐसे में अगर यह समाज संगठित होकर अपनी राजनीतिक मांगों को लेकर सक्रिय होता है, तो इसका सीधा असर चुनावी परिणामों पर पड़ सकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि 2027 के आगामी चुनावों को देखते हुए सभी प्रमुख राजनीतिक दलों के लिए यह जरूरी होगा कि वे सामाजिक संतुलन और प्रतिनिधित्व के मुद्दे पर गंभीरता से विचार करें।

क्या है पूरा मुद्दा

पूर्वांचल के राजनीतिक केंद्र गोरखपुर में निषाद (केवट/मल्लाह) समाज की बड़ी और प्रभावशाली आबादी लंबे समय से स्थानीय चुनावी समीकरणों को प्रभावित करती रही है। यह समाज परंपरागत रूप से जल-आधारित व्यवसायों से जुड़ा रहा है, लेकिन समय के साथ इसकी सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक भागीदारी भी मजबूत हुई है। इसके बावजूद आरोप यह है कि भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने पिछले कई दशकों में गोरखपुर लोकसभा सीट से इस समाज के किसी भी प्रतिनिधि को उम्मीदवार नहीं बनाया। यही कारण है कि अब यह मुद्दा केवल टिकट वितरण तक सीमित नहीं रह गया, बल्कि सामाजिक प्रतिनिधित्व और राजनीतिक समानता का प्रश्न बन गया है। स्थानीय स्तर पर यह चर्चा तेज हो गई है कि जब किसी समाज की जनसंख्या और योगदान दोनों ही महत्वपूर्ण हैं, तो उसे शीर्ष स्तर की राजनीति में उचित भागीदारी क्यों नहीं मिल रही। यही सवाल अब सार्वजनिक मंचों, संगठनों और सोशल मीडिया के जरिए उठाया जा रहा है।

कौन उठा रहा है सवाल

इस मुद्दे को प्रमुखता से उठाने वालों में फिशरमैन आर्मी सामाजिक संगठन के प्रदेश अध्यक्ष और बहुजन राजनीति से जुड़े नेता राजकपूर निषाद शामिल हैं। राजकपूर निषाद ने इस विषय को न सिर्फ राजनीतिक बल्कि सामाजिक न्याय का मुद्दा बताते हुए कहा है कि निषाद समाज को लगातार नजरअंदाज किया जाना लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ है। उनके अनुसार, यह केवल एक दल विशेष का मामला नहीं, बल्कि पूरे राजनीतिक तंत्र की सोच पर सवाल खड़ा करता है। इसके अलावा, फिशरमैन आर्मी, बहुजन संगठनों और कई स्थानीय सामाजिक समूहों ने भी इस मुद्दे को जोर-शोर से उठाया है। इन संगठनों का कहना है कि अब समय आ गया है जब हर समाज को उसकी वास्तविक जनसंख्या और योगदान के आधार पर राजनीतिक हिस्सेदारी दी जानी चाहिए।

राजनीतिक असर क्या होगा

राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, निषाद समाज गोरखपुर और आसपास के क्षेत्रों में एक महत्वपूर्ण “वोट बैंक” के रूप में देखा जाता है। यदि यह समाज एकजुट होकर किसी एक मुद्दे या उम्मीदवार के पक्ष में खड़ा होता है, तो चुनावी परिणामों को प्रभावित कर सकता है। आने वाले चुनावों में यह मुद्दा एक बड़े चुनावी एजेंडा के रूप में उभर सकता है। विभिन्न राजनीतिक दल इस समाज को साधने के लिए अपनी रणनीतियों में बदलाव कर सकते हैं। टिकट वितरण, गठबंधन और चुनावी प्रचार में इस मुद्दे की झलक साफ दिखाई दे सकती है। इसके साथ ही, यह भी संभावना जताई जा रही है कि यदि निषाद समाज को अपेक्षित प्रतिनिधित्व नहीं मिला, तो यह असंतोष वोट ट्रांसफर या नए राजनीतिक विकल्पों की तलाश के रूप में सामने आ सकता है।

विशेषज्ञों की राय

विशेषज्ञ इस पूरे घटनाक्रम को भारतीय लोकतंत्र में सामाजिक न्याय और प्रतिनिधित्व के व्यापक मुद्दे से जोड़कर देख रहे हैं। उनका मानना है कि यह मामला केवल गोरखपुर तक सीमित नहीं है, बल्कि देश के कई हिस्सों में ऐसे ही सवाल उठ रहे हैं। उनके अनुसार, राजनीति में जातीय और सामाजिक समीकरण हमेशा से महत्वपूर्ण रहे हैं, लेकिन अब जागरूकता बढ़ने के साथ समाज अपने अधिकारों और हिस्सेदारी को लेकर अधिक मुखर हो रहा है। कुछ विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि इस मुद्दे के कारण जातीय समीकरणों में बदलाव देखने को मिल सकता है। पारंपरिक वोट बैंक की राजनीति में नई दिशा और संतुलन बन सकता है, जिससे चुनावी रणनीतियां भी प्रभावित होंगी। इसके अलावा, यह भी माना जा रहा है कि यदि राजनीतिक दल समय रहते इस तरह के मुद्दों को समझकर उचित कदम नहीं उठाते, तो उन्हें चुनावी नुकसान उठाना पड़ सकता है।

Source : Social Media FB ( राजकपूर निषाद समर्थक )

 

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