काठमांडू | मानव और वन्यजीवों के बीच बढ़ते संघर्ष को कम करने तथा प्रकृति और मानव समाज के बीच संतुलित सह-अस्तित्व स्थापित करने के उद्देश्य से नेपाली कांग्रेस के सेंट्रल पॉलिसी, रिसर्च एंड ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट के तत्वावधान में तथा ग्रीन टेबल सबकमेटी की देखरेख में शनिवार को “मानव–वन्यजीव टकराव और सुरक्षित सह-अस्तित्व” विषय पर ग्रीन टेबल सीरीज़ का 12वाँ पैनल डिस्कशन आयोजित किया गया। कार्यक्रम में पर्यावरण विशेषज्ञों, वन अधिकारियों, शोधकर्ताओं, नीति निर्माताओं और सामाजिक संगठनों के प्रतिनिधियों ने भाग लेते हुए मानव–वन्यजीव संघर्ष की बढ़ती घटनाओं पर गंभीर चिंता व्यक्त की।
विशेषज्ञों का मानना था कि केवल वन्यजीव संरक्षण की नीतियाँ पर्याप्त नहीं हैं, बल्कि मानव जीवन, आजीविका और स्थानीय समुदायों की सुरक्षा को समान महत्व देते हुए संरक्षण की नई सोच विकसित करनी होगी। इसके लिए राष्ट्रीय वन नीति की व्यापक समीक्षा, आधुनिक तकनीक का उपयोग, राहत एवं मुआवजा व्यवस्था में सुधार, मानवाधिकार आधारित संरक्षण नीति और बेहतर वन आवासों के संरक्षण की दिशा में ठोस कदम उठाना समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है।

सह-अस्तित्व ही स्थायी समाधान
कार्यक्रम की शुरुआत में आयोजकों ने कहा कि नेपाल सहित दक्षिण एशिया के कई देशों में तेजी से बदलते भू-उपयोग, शहरी विस्तार, कृषि क्षेत्र में वृद्धि और जंगलों के सिकुड़ने के कारण मानव और वन्यजीवों के बीच संघर्ष लगातार बढ़ रहा है। जंगली हाथी, बाघ, तेंदुआ, भालू, गैंडा और अन्य वन्यजीव भोजन एवं आवास की तलाश में आबादी वाले क्षेत्रों में प्रवेश कर रहे हैं, जिससे जनहानि, फसल नुकसान और आर्थिक क्षति की घटनाएँ बढ़ी हैं।विशेषज्ञों ने स्पष्ट किया कि वन्यजीवों को केवल समस्या मानकर उनके विरुद्ध कार्रवाई करना समाधान नहीं है। यदि जंगल सुरक्षित होंगे, प्राकृतिक गलियारे (कॉरिडोर) संरक्षित रहेंगे और स्थानीय समुदायों की सहभागिता सुनिश्चित होगी, तभी मानव और वन्यजीव दोनों सुरक्षित रह सकेंगे। इसलिए “कोएग्ज़िस्टेंस” अर्थात सह-अस्तित्व की अवधारणा को राष्ट्रीय विकास नीति का हिस्सा बनाया जाना चाहिए।

मानव–वन्यजीव संघर्ष रोकने के लिए विशेषज्ञों के प्रमुख सुझाव
मानव–वन्यजीव संघर्ष को केवल वन विभाग या स्थानीय प्रशासन का विषय मानना पर्याप्त नहीं है। यह पर्यावरण संरक्षण, जैव विविधता, मानव सुरक्षा, आजीविका, जलवायु परिवर्तन और सतत विकास से जुड़ा बहुआयामी मुद्दा है। ग्रीन टेबल सीरीज़ के 12वें कार्यक्रम में विशेषज्ञों ने इस चुनौती से निपटने के लिए कई महत्वपूर्ण सुझाव प्रस्तुत किए, जिनका उद्देश्य मानव और वन्यजीवों के बीच सुरक्षित एवं संतुलित सह-अस्तित्व स्थापित करना है।

1. राष्ट्रीय वन नीति की व्यापक समीक्षा
विशेषज्ञों का मानना है कि वर्तमान राष्ट्रीय वन नीति को बदलती पर्यावरणीय परिस्थितियों, जलवायु परिवर्तन, बढ़ती जनसंख्या और भूमि उपयोग में हो रहे परिवर्तनों के अनुरूप अद्यतन किया जाना चाहिए। नई नीति में वन संरक्षण के साथ-साथ स्थानीय समुदायों की सुरक्षा, आजीविका और विकास को समान महत्व दिया जाए। नीति निर्माण में वैज्ञानिक अनुसंधान, स्थानीय अनुभव और समुदायों की भागीदारी को भी शामिल किया जाना आवश्यक है।

2. मानवाधिकार आधारित संरक्षण नीति लागू की जाए
वन्यजीव संरक्षण की योजनाओं में स्थानीय लोगों के अधिकारों और आवश्यकताओं को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। यदि किसी परिवार की फसल नष्ट होती है, पशुधन का नुकसान होता है या किसी व्यक्ति की जान या संपत्ति को क्षति पहुँचती है, तो प्रभावित लोगों को न्यायपूर्ण और समयबद्ध सहायता मिलनी चाहिए। संरक्षण का उद्देश्य केवल वन्यजीवों की रक्षा नहीं, बल्कि मानव जीवन और गरिमा की रक्षा भी होना चाहिए।

3. राहत एवं मुआवजा व्यवस्था को सरल और त्वरित बनाया जाए
वन्यजीवों के हमलों या फसल एवं संपत्ति के नुकसान की स्थिति में मुआवजा प्राप्त करने की प्रक्रिया अक्सर जटिल और समय लेने वाली होती है। विशेषज्ञों ने सुझाव दिया कि आवेदन प्रक्रिया को डिजिटल और पारदर्शी बनाया जाए, क्षति का शीघ्र आकलन हो तथा प्रभावित परिवारों को निर्धारित समय सीमा के भीतर आर्थिक सहायता उपलब्ध कराई जाए। इससे लोगों में संरक्षण कार्यक्रमों के प्रति विश्वास बढ़ेगा।

4. आधुनिक तकनीकों का व्यापक उपयोग बढ़ाया जाए
मानव–वन्यजीव संघर्ष को कम करने के लिए आधुनिक तकनीक अत्यंत प्रभावी साबित हो सकती है। ड्रोन निगरानी, जीपीएस कॉलर, कैमरा ट्रैप, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित पूर्व चेतावनी प्रणाली, मोबाइल अलर्ट, सैटेलाइट मॉनिटरिंग और स्मार्ट फेंसिंग जैसी तकनीकों का उपयोग बढ़ाया जाए। इन तकनीकों से वन्यजीवों की गतिविधियों पर निगरानी रखी जा सकेगी और संभावित खतरे की जानकारी समय रहते स्थानीय लोगों तक पहुँचाई जा सकेगी।

5. वन्यजीव गलियारों (कॉरिडोर) का संरक्षण और विकास
वन्यजीवों के प्राकृतिक आवागमन मार्गों पर अतिक्रमण, सड़क निर्माण और अनियोजित विकास कार्यों के कारण संघर्ष बढ़ रहा है। विशेषज्ञों ने कहा कि पारंपरिक वन्यजीव कॉरिडोर की पहचान कर उन्हें कानूनी संरक्षण दिया जाए तथा जहाँ आवश्यक हो, नए पारिस्थितिक गलियारों का विकास किया जाए ताकि वन्यजीव सुरक्षित रूप से अपने प्राकृतिक आवासों के बीच आवाजाही कर सकें।

6. जंगलों का विस्तार एवं प्राकृतिक आवास सुरक्षित किए जाएँ
जंगलों के लगातार सिकुड़ने और प्राकृतिक संसाधनों के क्षरण से वन्यजीव भोजन और पानी की तलाश में आबादी वाले क्षेत्रों में प्रवेश कर रहे हैं। इस समस्या के समाधान के लिए बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण, क्षतिग्रस्त वन क्षेत्रों का पुनर्जीवन, जल स्रोतों का संरक्षण और जैव विविधता को बढ़ावा देने वाली योजनाओं को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। स्वस्थ और समृद्ध जंगल ही मानव–वन्यजीव संघर्ष को कम करने का स्थायी समाधान हैं।

7. स्थानीय समुदायों की भागीदारी सुनिश्चित की जाए
विशेषज्ञों ने कहा कि संरक्षण कार्यक्रम तभी सफल होंगे जब स्थानीय समुदाय उनकी योजना और क्रियान्वयन में सक्रिय भागीदार बनेंगे। किसानों, ग्रामीणों, महिला समूहों, युवाओं और सामुदायिक वन उपयोगकर्ता समूहों को प्रशिक्षण देकर संरक्षण कार्यों में शामिल किया जाए। स्थानीय लोगों के अनुभव और पारंपरिक ज्ञान को नीति निर्माण में महत्व दिया जाना चाहिए।

8. सीमा पार संरक्षण सहयोग को मजबूत किया जाए
नेपाल और भारत जैसे देशों के बीच कई वन क्षेत्र और वन्यजीव गलियारे साझा हैं। इसलिए सीमा पार वन्यजीवों की निगरानी, सूचना साझा करने, संयुक्त शोध, आपातकालीन प्रतिक्रिया और संरक्षण योजनाओं में सहयोग बढ़ाना आवश्यक है। क्षेत्रीय स्तर पर समन्वित प्रयासों से हाथी, बाघ, गैंडा और अन्य प्रवासी वन्यजीवों की बेहतर सुरक्षा सुनिश्चित की जा सकती है।

9. पर्यावरण शिक्षा एवं जन-जागरूकता अभियान चलाए जाएँ
मानव–वन्यजीव संघर्ष को कम करने के लिए लोगों में जागरूकता बढ़ाना अत्यंत आवश्यक है। विद्यालयों, महाविद्यालयों, स्थानीय समुदायों और मीडिया के माध्यम से संरक्षण, वन्यजीव व्यवहार, सुरक्षा उपायों और पर्यावरणीय संतुलन के महत्व के बारे में नियमित अभियान चलाए जाएँ। जागरूक नागरिक ही संरक्षण प्रयासों को सफल बना सकते हैं।
10. वैज्ञानिक शोध और नीति निर्माण के बीच समन्वय स्थापित किया जाए
विशेषज्ञों ने सुझाव दिया कि संरक्षण संबंधी नीतियाँ केवल पारंपरिक अनुभवों पर नहीं, बल्कि वैज्ञानिक शोध, नवीनतम आँकड़ों और तकनीकी विश्लेषण के आधार पर तैयार की जाएँ। विश्वविद्यालयों, अनुसंधान संस्थानों, वन विभागों और नीति निर्माताओं के बीच नियमित संवाद और सहयोग स्थापित किया जाए, ताकि निर्णय प्रमाण-आधारित हों और उनका प्रभाव दीर्घकालिक एवं टिकाऊ हो।
11. जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को नीति में शामिल किया जाए
जलवायु परिवर्तन के कारण वनों की संरचना, जल स्रोतों की उपलब्धता और वन्यजीवों के व्यवहार में तेजी से बदलाव आ रहा है। इसलिए भविष्य की वन और संरक्षण नीतियों में जलवायु परिवर्तन के जोखिमों का समुचित आकलन करते हुए अनुकूलन (Adaptation) और लचीलापन (Resilience) बढ़ाने वाली रणनीतियों को शामिल किया जाना चाहिए।
12. सह-अस्तित्व की संस्कृति को बढ़ावा दिया जाए
विशेषज्ञों का निष्कर्ष था कि मानव और वन्यजीव एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि एक ही पारिस्थितिकी तंत्र के अभिन्न अंग हैं। इसलिए संरक्षण की ऐसी संस्कृति विकसित की जाए जिसमें विकास, पर्यावरण और मानव सुरक्षा के बीच संतुलन स्थापित हो। दीर्घकालिक समाधान केवल सह-अस्तित्व, वैज्ञानिक योजना, सामुदायिक सहभागिता और प्रभावी शासन से ही संभव है।
रिपोर्ट : कोटो न्यूज़ नेटवर्क (KNN) |