‘Cockroach Janta Party’ के संस्थापक अभिजीत दिपके के वायरल सोशल मीडिया बयान के बाद डिजिटल राजनीति और मुख्यधारा मीडिया को लेकर देशभर में बहस तेज हो गई।
कोटो महासंघ देश संवाददाता,भारत 23 मई 2026 | देश की तेजी से बदलती डिजिटल राजनीति के बीच ‘Cockroach Janta Party’ के संस्थापक Abhijeet Dipke ने एक ऐसा बयान दिया है जिसने सोशल मीडिया से लेकर राजनीतिक गलियारों तक नई बहस छेड़ दी है। अभिजीत दिपके ने अपने आधिकारिक सोशल मीडिया संदेश में स्पष्ट शब्दों में कहा “मैं ‘गोदी मीडिया’ के किसी भी एंकर के साथ बातचीत नहीं करूँगा। इसलिए कृपया इंटरव्यू या बातचीत के लिए मुझसे संपर्क करने की ज़हमत न उठाएँ।” यह बयान सामने आते ही इंटरनेट पर तेजी से वायरल हो गया। कुछ ही घंटों में हजारों लोगों ने इस पोस्ट को शेयर किया और कई सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर #CockroachJantaParty और #AbhijeetDipke ट्रेंड करने लगे। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह बयान केवल किसी मीडिया संस्थान की आलोचना भर नहीं है, बल्कि यह वर्तमान दौर की उस राजनीतिक मानसिकता को दर्शाता है जिसमें मुख्यधारा मीडिया और नए डिजिटल राजनीतिक समूहों के बीच दूरी लगातार बढ़ती जा रही है। ‘Cockroach Janta Party’ पिछले कुछ महीनों से सोशल मीडिया पर अपने अनोखे नाम, व्यंग्यात्मक अभियानों और आक्रामक राजनीतिक टिप्पणियों के कारण चर्चा में बनी हुई है। पार्टी के समर्थक इसे “जनता की आवाज़” बताते हैं, जबकि आलोचक इसे केवल वायरल राजनीति का हिस्सा मानते हैं।

सोशल मीडिया आधारित राजनीति का नया चेहरा
भारत में पिछले कुछ वर्षों के दौरान राजनीति का स्वरूप तेजी से बदला है। पहले जहां राजनीतिक दलों की पहचान बड़े जनसभाओं, पोस्टरों और टीवी डिबेट्स से होती थी, वहीं अब सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स राजनीतिक प्रचार का सबसे प्रभावी माध्यम बनते जा रहे हैं। ‘Cockroach Janta Party’ इसी बदलते दौर का एक उदाहरण मानी जा रही है। पार्टी ने पारंपरिक राजनीतिक अभियानों की बजाय डिजिटल मीम, वायरल वीडियो, व्यंग्यात्मक स्लोगन और सोशल मीडिया पोस्ट्स को अपनी पहचान बनाया है। राजनीतिक विशेषज्ञों के अनुसार, युवा पीढ़ी अब सीधे और आक्रामक संदेशों से अधिक प्रभावित होती है। यही वजह है कि इस तरह के डिजिटल राजनीतिक अभियानों को तेजी से लोकप्रियता मिल रही है। अभिजीत दिपके के हालिया बयान को भी इसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। उनके समर्थकों का कहना है कि मुख्यधारा मीडिया जनता के असली मुद्दों को नहीं दिखाता और केवल सत्ता के पक्ष में माहौल तैयार करता है। कई सोशल मीडिया यूजर्स ने दिपके के बयान का समर्थन करते हुए लिखा कि आज का डिजिटल युग नेताओं को सीधे जनता से संवाद करने का अवसर देता है और अब उन्हें टीवी स्टूडियो पर निर्भर रहने की आवश्यकता नहीं है। हालांकि कुछ लोगों ने सवाल उठाया कि यदि कोई राजनीतिक संगठन मीडिया से पूरी तरह दूरी बना लेता है, तो जनता तक निष्पक्ष सवाल और जवाब कैसे पहुंचेंगे।
मीडिया बनाम डिजिटल राजनीति की बढ़ती खाई
अभिजीत दिपके के बयान के बाद मीडिया जगत में भी प्रतिक्रियाओं का दौर शुरू हो गया। कई पत्रकारों और मीडिया विशेषज्ञों ने इस बयान को लोकतांत्रिक परंपराओं के खिलाफ बताया। कुछ वरिष्ठ पत्रकारों का कहना है कि मीडिया लोकतंत्र का चौथा स्तंभ माना जाता है और किसी भी राजनीतिक संगठन को सवालों का सामना करने के लिए तैयार रहना चाहिए। एक मीडिया विश्लेषक ने कहा कि “यदि कोई नेता केवल अपने समर्थकों के बीच संवाद करेगा और कठिन सवालों से बचेगा, तो इससे लोकतांत्रिक जवाबदेही कमजोर हो सकती है।” दूसरी ओर, स्वतंत्र डिजिटल पत्रकारों और वैकल्पिक मीडिया प्लेटफॉर्म्स से जुड़े लोगों ने दिपके के बयान को “मीडिया के केंद्रीकरण के खिलाफ प्रतिक्रिया” बताया। उनका कहना है कि कई बड़े टीवी चैनलों पर निष्पक्ष बहस की जगह राजनीतिक एजेंडा हावी हो चुका है। पिछले कुछ वर्षों में “गोदी मीडिया” शब्द भारतीय राजनीति में काफी लोकप्रिय हुआ है। विपक्षी दलों और सरकार विरोधी समूहों द्वारा अक्सर उन मीडिया संस्थानों के लिए इस शब्द का इस्तेमाल किया जाता है जिन्हें वे सत्ता समर्थक मानते हैं। हालांकि मीडिया संगठनों का कहना है कि पत्रकारिता का उद्देश्य सभी पक्षों को मंच देना होता है और किसी भी चैनल को एकतरफा तरीके से “गोदी मीडिया” कहना पत्रकारिता के पूरे पेशे को बदनाम करना है।

वायरल हो रही है ‘Cockroach Janta Party’
‘Cockroach Janta Party’ का नाम पहली बार सोशल मीडिया पर उस समय तेजी से वायरल हुआ जब पार्टी ने भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, महंगाई और राजनीतिक विशेषाधिकारों के खिलाफ व्यंग्यात्मक ऑनलाइन अभियान शुरू किए। पार्टी के वीडियो में आम राजनीतिक भाषणों की जगह इंटरनेट संस्कृति और मीम आधारित प्रस्तुति दिखाई देती है। यही कारण है कि यह संगठन युवाओं के बीच तेजी से लोकप्रिय हो रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि आज की राजनीति में “वायरलिटी” एक नई ताकत बन चुकी है। कई बार सोशल मीडिया पर ट्रेंड होने वाला मुद्दा टीवी चैनलों और अखबारों की सुर्खियां तय करने लगता है। अभिजीत दिपके और उनकी पार्टी इसी डिजिटल प्रभाव का इस्तेमाल कर रहे हैं। पार्टी के समर्थकों का दावा है कि वे “व्यवस्था विरोधी राजनीति” को नए अंदाज में जनता के सामने रख रहे हैं। हालांकि आलोचक कहते हैं कि केवल वायरल होना किसी राजनीतिक विचारधारा की गंभीरता साबित नहीं करता। उनका मानना है कि सोशल मीडिया आधारित राजनीति कई बार भावनात्मक प्रतिक्रियाओं पर आधारित होती है और उसमें ठोस नीतियों की कमी दिखाई देती है। राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि आने वाले समय में ऐसे कई नए संगठन सामने आ सकते हैं जो पारंपरिक राजनीतिक ढांचे को चुनौती देंगे।
बदल रही है राजनीतिक संवाद की दिशा
अभिजीत दिपके का बयान केवल एक सोशल मीडिया पोस्ट नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे भारतीय राजनीति में बदलते संवाद का संकेत भी समझा जा रहा है। आज के दौर में नेता सीधे लाइव वीडियो, पॉडकास्ट, यूट्यूब चैनलों और सोशल मीडिया पोस्ट्स के माध्यम से अपने समर्थकों तक पहुंच रहे हैं। इससे पारंपरिक मीडिया की भूमिका में भी बदलाव आ रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि पहले जनता तक जानकारी पहुंचाने का मुख्य माध्यम टीवी और अखबार होते थे, लेकिन अब डिजिटल प्लेटफॉर्म्स ने उस व्यवस्था को चुनौती दे दी है। इसके बावजूद लोकतांत्रिक व्यवस्था में स्वतंत्र सवाल-जवाब की भूमिका को बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। कई विश्लेषकों का कहना है कि मीडिया से दूरी बनाने की राजनीति भविष्य में संवादहीनता को बढ़ा सकती है। दूसरी ओर, सोशल मीडिया समर्थक इसे “जनता की सीधी भागीदारी” का नया मॉडल बता रहे हैं, जहां कोई भी व्यक्ति बिना बड़े मीडिया संस्थानों के माध्यम से अपनी बात लाखों लोगों तक पहुंचा सकता है। फिलहाल अभिजीत दिपके का बयान इंटरनेट पर लगातार चर्चा का विषय बना हुआ है और इसने मीडिया की विश्वसनीयता, डिजिटल राजनीति और लोकतांत्रिक संवाद को लेकर नई बहस छेड़ दी है।
रिपोर्ट : कोटो न्यूज़ नेटवर्क (KNN) | Source : Instagram